हनुमान चालीसा और हनुमान जी की आरती का संपूर्ण पाठ हिंदी में पढ़ें। नियमित पाठ से मिलती है शक्ति, शांति और सभी संकटों से मुक्ति।
हनुमान चालीसा एक प्रसिद्ध हिंदी भक्ति स्तोत्र है, जिसे भगवान हनुमान की महिमा और उनके अद्वितीय गुणों की प्रशंसा के लिए पढ़ा जाता है। यह चालीसा 40 चौपाइयों से मिलकर बनी होती है, जिसमें हनुमान जी की शक्ति, भक्ति, बुद्धि और सेवा भावना का विस्तृत वर्णन है। इसे रोज़ पढ़ने से मानसिक शांति मिलती है, नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है और जीवन में उत्साह बना रहता है। विशेष रूप से मंगलवार और शनिवार को इसका पाठ करना शुभ और फलदायक माना जाता है। हनुमान चालीसा न केवल एक धार्मिक पाठ है, बल्कि यह व्यक्ति को आत्मिक बल और साहस प्रदान करती है। यह भक्तों में आशा और विश्वास जगाने वाला एक दिव्य माध्यम है।
🙏 हनुमान चालीसा | Hanuman Chalisa
॥ दोहा ॥
श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मन मुकुर सुधारि।
बरनऊं रघुबर बिमल जसु, जो दायक फल चारि॥
॥ चोपाई ॥
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥
राम दूत अतुलित बल धामा।
अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा॥
महाबीर बिक्रम बजरंगी।
कुमति निवार सुमति के संगी॥
कंचन बरन बिराज सुबेसा।
कानन कुंडल कुंचित केसा॥
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै।
काँधे मूँज जनेऊ साजै॥
संकर सुवन केसरी नंदन।
तेज प्रताप महा जग वंदन॥
विद्यावान गुनी अति चातुर।
राम काज करिबे को आतुर॥
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।
राम लखन सीता मन बसिया॥
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा।
बिकट रूप धरि लंक जरावा॥
भीम रूप धरि असुर संहारे।
रामचन्द्र के काज सँवारे॥
लाय सजीवन लखन जियाए।
श्री रघुबीर हरषि उर लाए॥
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं।
अस कहि श्रीपति कण्ठ लगावैं॥
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा।
नारद सारद सहित अहीसा॥
जम कुबेर दिगपाल जहां ते।
कवि कोविद कहि सके कहाँ ते॥
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा।
राम मिलाय राजपद दीन्हा॥
तुम्हरो मंत्र विभीषण माना।
लंकेश्वर भए सब जग जाना॥
जुग सहस्त्र जोजन पर भानू।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं।
जलधि लांघि गये अचरज नाहीं॥
दुर्गम काज जगत के जेते।
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥
राम दुआरे तुम रखवारे।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥
सब सुख लहै तुम्हारी सरना।
तुम रक्षक काहू को डरना॥
आपन तेज सम्हारो आपै।
तीनों लोक हांक ते कांपै॥
भूत पिशाच निकट नहिं आवै।
महाबीर जब नाम सुनावै॥
नासै रोग हरै सब पीरा।
जपत निरंतर हनुमत बीरा॥
संकट ते हनुमान छुड़ावै।
मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥
सब पर राम तपस्वी राजा।
तिनके काज सकल तुम साजा॥
और मनोरथ जो कोइ लावै।
सोइ अमित जीवन फल पावै॥
चारों जुग परताप तुम्हारा।
है परसिद्ध जगत उजियारा॥
साधु-संत के तुम रखवारे।
असुर निकंदन राम दुलारे॥
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता।
अस बर दीन जानकी माता॥
राम रसायन तुम्हरे पासा।
सदा रहो रघुपति के दासा॥
तुम्हरे भजन राम को पावै।
जनम-जनम के दुख बिसरावै॥
अन्त काल रघुवर पुर जाई।
जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई॥
और देवता चित्त न धरई।
हनुमत सेइ सर्ब सुख करई॥
संकट कटै मिटै सब पीरा।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥
जय जय जय हनुमान गोसाईं।
कृपा करहु गुरुदेव की नाईं॥
जो सत बार पाठ कर कोई।
छूटहि बंदि महा सुख होई॥
जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा।
होय सिद्धि साखी गौरीसा॥
तुलसीदास सदा हरि चेरा।
कीजै नाथ हृदय महँ डेरा॥
॥ दोहा ॥
पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥
हनुमान जी की आरती भगवान हनुमान की पूजा का एक अभिन्न अंग है, जिसे आराधना के अंत में गाया जाता है। यह आरती उनके शौर्य, सेवा, और रक्षक स्वरूप की स्मृति दिलाती है। भक्त इसे विशेष रूप से शाम के समय दीप जलाकर गाते हैं, जिससे वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। आरती की धुन और शब्द न केवल मन को शांति देते हैं, बल्कि यह बताती है कि हनुमान जी संकटों से रक्षा करने वाले, दुखों को दूर करने वाले और भक्तों के संकटमोचक हैं। नियमित आरती से जीवन में भय, बाधा, और आलस्य दूर होता है और भक्ति भाव मजबूत होता है। यह आरती श्रद्धालुओं के लिए एक ऐसा मार्ग है, जिससे वे प्रभु हनुमान से गहरा संबंध स्थापित कर सकते हैं।
🔥 हनुमान जी की आरती | Hanuman Aarti
आरती कीजै हनुमान लला की,
दुष्ट दलन रघुनाथ कला की॥
जाके बल से गिरिवर कांपे,
रोग दोष जाके निकट न झांके॥
अंजनि पुत्र महा बलदायी,
संतन के प्रभु सदा सहाई॥
दे बीरा रघुनाथ पठाए,
लंका जारि सिया सुधि लाए॥
लंका सो कोट समुद्र-सी खाई,
जात पवनसुत बार न लाई॥
लंका जारि असुर संहारे,
सियाराम जी के काज संवारे॥
लक्ष्मण मुर्छित पड़े सकारे,
आनि संजीवन प्राण उबारे॥
पैठि पाताल तोरि जमकारे,
अहिरावण की भुजा उखारे॥
बाएं भुजा असुर दल मारे,
दाहिने भुजा संतजन तारे॥
सुर-नर मुनि जन आरती उतारें,
जय जय जय हनुमान उचारें॥
कंचन थार कपूर लौ छाई,
आरती करत अंजना माई॥
जो हनुमान जी की आरती गावे,
बसि बैकुंठ परमपद पावे॥